पर्यावरण संरक्षण से एनजीटी तक संघर्ष, ‘
आई आई टी कानपुर ने गोवा वार्षिक कार्यक्रम के लिए किया आमंत्रित

म्योरपुर/पंकज सिंह
सोनभद्र की धरती खनिज संपदा से समृद्ध है, लेकिन इसी संपदा की कीमत यहां के जंगल, नदियां, जमीन और ग्रामीण आबादी लंबे समय से चुकाती रही है। ऐसे दौर में पर्यावरण संरक्षण और लोगों के अधिकारों को लेकर लगातार आवाज उठाने वाले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार जगतनारायण विश्वकर्मा को आई आई टी कानपुर ने वार्षिक सम्मेलन के लिए वक्ता के रूप में आमंत्रित किया है ,जिसमे देश भर के शोध छात्र और प्रोफेसर , वैज्ञानिक, विभिन्न देश के विशेषज्ञ प्रतिभाग करेंगे ,कार्यक्रम अगले माह 26 और 27 अक्टूबर को गोवा इंटरनेशनल में आयोजित होगा।पिछले कई वर्षों से जल, जंगल और जमीन के सवाल को जनआंदोलन से जोड़ने का प्रयास करने वाले विश्वकर्मा का कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास नहीं होना चाहिए जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को प्रदूषित पानी, हवा और उजड़ते जंगलों के रूप में चुकानी पड़े।
जगतनारायण विश्वकर्मा ने सोनभद्र में अवैध खनन, प्रदूषण, नदियों की स्थिति और पर्यावरणीय नुकसान जैसे मुद्दों को स्थानीय स्तर से उठाकर राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का प्रयास किया। वर्ष 2014 में एनजीटी से जुड़े मामले ने उन्हें पर्यावरण के सवालों को कानूनी मंच पर रखने की दिशा में पहचान दिलाई। समय-समय पर रिहंद, कनहर, सोन और रेणुका नदियों को प्रदूषण से बचाने, अवैध खनन पर रोक और पर्यावरणीय नियमों के पालन की मांग को लेकर उन्होंने आंदोलन और जनजागरण किया।
उनका मानना है कि किसी भी पर्यावरणीय समस्या का समाधान केवल सरकारी कागजों में नहीं, बल्कि प्रभावित गांवों के लोगों की भागीदारी से संभव है। इसी सोच के साथ उन्होंने ग्रामीणों को उनके जलस्रोत, जंगल और जमीन के संरक्षण के प्रति जागरूक करने का काम जारी रखा।निर्माता सुरेंद्र सिंह की डॉक्यूमेंट्री फिल्म
‘हर घर शुद्ध जल’ से पर्दे तक पहुंची पर्यावरण की पीड़ा
सोनभद्र-सिंगरौली क्षेत्र में प्रदूषण और उससे प्रभावित लोगों की जिंदगी को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘हर घर शुद्ध जल’ फिल्म से जुड़े प्रयास भी इसी अभियान की एक कड़ी हैं। फिल्म के माध्यम से शुद्ध पानी, प्रदूषण और स्वास्थ्य के सवाल को व्यापक समाज के सामने रखने का प्रयास किया गया है।यह फिल्म में
जगतनारायण का सहयोग रहा ।विश्वकर्मा का कहना है कि पर्यावरण की लड़ाई केवल धरना, प्रदर्शन या अदालत तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। फिल्म, साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा और जनसंवाद के माध्यम से भी लोगों को यह समझाना जरूरी है कि साफ पानी और स्वच्छ हवा केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन का अधिकार है।
फिल्म को पर्यावरणीय विषय पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली सराहना ने भी इस मुद्दे को व्यापक मंच देने में मदद की है। विश्वकर्मा का जोर लोगों को केवल समस्या बताने के बजाय समाधान की प्रक्रिया में भागीदार बनाने पर रहा है। गांवों में जल संरक्षण, जंगल बचाने, प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और स्थानीय लोगों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर लगातार संवाद उनकी गतिविधियों का हिस्सा रहे हैं।
उनका कहना है कि “जल है तो जंगल है, जंगल है तो जमीन है और इन तीनों के सुरक्षित रहने से ही गांव और आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित रहेंगी।”
सोनभद्र जैसे खनन और औद्योगिक क्षेत्र में पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की चुनौती लगातार बनी हुई है। ऐसे मे विश्वकर्मा का प्रयास लोगों के बीच पर्यावरणीय सवालों को चर्चा के केंद्र में लाने और उन्हें अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक करने का है। उनका संघर्ष इस बात की मिसाल है










