हिन्दू मुस्लिम एकता का मिशाल बना म्योरपुर का मोहर्रम

गंगा जमुनी तहजीब के तहत हिन्दू भाइयो ने मुस्लिम बन्धुओ को अंग वस्त्र भेट कर कराया जलपान
म्योरपुर /पंकज सिंह
म्योरपुर मस्जिद से शुक्रवार को शाम छःबजे अपने अपने चौक से ताजियादारों ने ताजिया निकाल मस्जिद पर गये इस दौरान बड़ी संख्या मे मुस्लिम समुदाय के महिला पुरुष एव बच्चे शामिल रहे मस्जिद से ताजिया निकल रामलीला स्टेज होते हुये भीड़ एक जलूस मे तब्दील हो गयी इस दौरान गुरुद्वारा मोड़ पर जय श्री राम अखड़ा समिति के सदस्यों ने गंगा जमुनी तहजीब का मिशाल कायम करते हुये तजियादारो को अंग वस्त्र भेट कर जलपान कराया इस दौरान मुस्लिम बंधुओ द्वारा एक से बढ़ कर एक हैरतअगेज कर्तब देखने को मिला म्योरपुर मस्जिद के मौलाना ने बताया कि
मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना और इस्लाम के चार पवित्र महीनों में से एक है। इसे किसी त्योहार या खुशी के रूप में नहीं, बल्कि पैगंबर हजरत मुहम्मद के नवासे (नाती) इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की इराक के कर्बला में हुई शहादत की याद में गम और मातम के तौर पर मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि 680 ईस्वी (हिजरी सन 61) में यजीद नाम का एक अत्याचारी शासक सत्ता में आया, जो इस्लाम के नियमों के खिलाफ शासन चला रहा था। इमाम हुसैन ने यजीद की सत्ता को मानने से इंकार कर दिया क्योंकि वे धर्म और इंसानियत की रक्षा करना चाहते थे। अत्याचारी शाशक के सामने इमाम हुसैन नहीं झुके अपने परिवार और कुछ वफादार अनुयायियों के साथ मदीना से इराक के ‘कर्बला’ नामक रेगिस्तान की ओर जा रहे थे। वहां यजीद की हजारों की विशाल सेना ने उन्हें और उनके 72 साथियों को घेर लिया। मुहर्रम के दसवें दिन (जिसे आशूरा कहा जाता है) इमाम हुसैन और उनके साथियों ने भूखे-प्यासे रहकर भी यजीद की सेना के अत्याचारों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इस दौरान इमाम हुसैन और उनके सभी पुरुष साथी शहीद कर दिए गए। इमाम हुसैन का बलिदान हमें यह सिखाता है कि सत्य और न्याय के लिए जान भी देनी पड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।इस दौरान सदर अयूब अली,अनवर अली, हकीक, सफीक,इरफ़ान अहमद खांन,अलीम खांन, दीपक सिंह, सुनील अग्रहरी (गोटिया जी)गणेश कुमार जायसवाल,वीरेंद्र सोनी, सुजीत कुमार, अमित आदि तमाम हिन्दू मुस्लिम भाई मौजूद रहे
वही सुरक्षा ब्योस्था मे म्योरपुर थाने के प्रभारी निरीक्षक रविकांत मिश्र मय फ़ोर्स मुस्तैद नजर आये









